Thursday, July 8, 2010

न धडकन है टूटी,

न दिल ही है बिछुडा ।

ज़रा सी ये दूरी

थी थोडी ज़रूरी

वरना ये सासें भी

ज़ख्मी हो जातीं ।

तेज़ हो चली थी,

ठहर न रही थी ।

ये थोडा सा संयम

और थोडा सा विरहा ।

मुझे थाम लेगा

मुझे राह देगा ।

राहें थी प्यारी

मुझे यूं लुभाती

भटक मैं चला था

ठहर न रहा था ।

मेरी थी गलती

तो सज़ा मैं ही मांगूँ

कष्ट जो तुम्हे हो

तो क्षमा भी मैं मांगूँ

मुझे माफ करना

खता भूल जाना

जो राहें पुरानी

उसी राह जाना ।

पल जो गुज़ारे

संग संग तुम्हारे

है मेरी अमानत

उसे न भुलाना ।

Sunday, May 24, 2009

किसी ने कहा ...

किसी ने कहा ...

अमृत नाम में कुछ तो है
जो जीवन दायिनी है ...
तभी तो 'अमृता' का ख्याल ही भर देता है
रग रग में ऊर्जा, उमंग और उत्साह !

अमृत का अस्तित्व कहीं है
तो वहीं कहीं है
जहां है अमृतघट का सिन्धु, अमृता - अमृत परिसर ...

मन से छुअन सिहरन देती है
तन की छुअन सा अहसास भी ..
अमृत बरसा जाती है
च्यवनप्राश बन जाती है
आती है चिर युवा होने का अहसास जगाने ..

कहाँ बसा है वह अमृत घट ,
कहीं तो नहीं सिवा ह्रदय के
जगाता है जीवन जीने की चाह
अमरता - नश्वरता के बीच का सेतु सा,
दौडा देता है खोज में उस कस्तूरी मृग की
जो है सदा से मेरे भीतर
सुगन्धित करता रहता है
चिरंतन निरंतर .. सदा सर्वदा... अमृता की तरह...

( शेष फिर... )

अमृत कलश - नमन


Ik Onkaar
Sat Naam
Kartaa Purakh
Nirbha-O
Nirvair
Akaal
Moorat
Ajoonee
Saibhang
Gur Parsaad.